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वांचो म्हारी वेदना

 गोकुल आला ग्वाल, रसिया राधा रास रा। हे नंद रा लाल, वांचों म्हारी वेदना ।। बंधण भव रा भंज, मुक्ति आपतो माधवा। हे कृष्ण नयन कंज, वांचों म्हारी वेदना ।। पकड़ पार्थ रथ हाथ, भांपी मन री भावना। हे द्वारिका रा नाथ , वांचों म्हारी वेदना ।। कर्म धर्म रख करन्न, पाप श्राप तें पोंछिया। करुणाकर करसन्न, वांचों म्हारी वेदना ।। जद पजियोह गयंद, छेवट तें छुडावियो । मुळके बाल मुकुंद, वांचों म्हारी वेदना  ।। चावल सावल चब्ब, साद सुदामा सारली। हे रसखां रा रब्ब, वांचों म्हारी वेदना ।। तोड़ तम्म तु तमाम, आत्मा करेह ऊजली।  हे सखि वाला श्याम, वांचों म्हारी वेदना।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°दीप चारण

गीत - सुपंखरो - महात्मा ईशर दास जी कृत

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 गीत - सुपंखरो - महात्मा ईशरदास जी कृत कूड़ो देवरो मंडाण मूल गीरिमेर सबे कूड़ो, कूड़ो हैं जमी को पीण्ड कूड़ो अंहकार। कूड़ो हैं कोरंभ अंब पवन्न जमाव कूड़ो, गीरिधारी नांहि कूड़ो एक ही गोपाल।।.    || 1 || खोटो माल खजाना को कोट बेट सबे खोटो, बाजीयां तबेलो खोटो खोटो त्रिया बंद। खोटो काम जड़ित्रा को नंग को बणाव खोटो, मोटो खोटो नांहि एक बाल ही मुकूंद।।      || 2 || झूठो हेत बंधवा को गोतरी कुटुम्ब झूठो, मात पिता सबे झूठो झूठो है मलक्क। झूठो लाभ साहरां को पुत्र परिवार झूठो, एक झूठो नांहि एक आत्मा अलख्ख।।.     || 3 || काचो काम केलकारी मीनाकारी काम काचो, काया को बणाव काचो काचो सबै काम। काचो राज इंद्र ही को आप ही ब्रह्माण्ड काचो, साचो बाबा साचो एक ईशरा को श्याम।।.     || 4 || टंकणकर्ता :- दिलीप सिंह चारण  गीत-सुपंखरो - :महात्मा ईशर दास जी कृत कांई न होता पवन्न पाणी जलां थलां अहंकार, वेद वाणी मंत्र जंत्र न होता विवेक। धर्म कर्म चंद्र सुर न होता आकाश धरा, या अला इस्लला अल्ला हुता आपें एक।।   बुद्धि थकी करत्तार शक्ति निपाय बीजी...

सांवरा

सुर छेड़े जद सांवरा बागां छाय बहार, डाल डाल अलि डोलता। पनघट चले पणिहार, सुर छेड़े जद सांवरा।। करे गीत गुंजार, डाल डाल अलि डोल नै । बागां छाय बहार, सुर छेड़े जद सांवरा ।। गोपी गावत गीत, उछेर उछेर खोपियां। पथ पथ पनपे प्रीत, सुर छेड़े जद सांवरा।। कोकिल करे किलोळ, मुदित मृगला कूदता । गायां बछड़ा टोळ, सुर छेड़े जद सांवरा ।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°दीप चारण नटवर जातो नट्ट  लुक लुक जाऊं लाजती, उदित होत जद भाण। जोये पनघट जावती, पकड़त नटवर पाण।। छल कर छलियो छेड़तो, घेर फोड़तो घट्ट। देवती ओलबा जदे , नटवर जातो नट्ट।। खाटो माखण खोसतो, बुकियों पकड़े बट्ट। जद जद जसुदा झांपती, नटवर जातो नट्ट।। कंकर  गुलेर  गेरतो, तुटती  गागर  तट्ट। पकड़ कान जद पूछती, नटवर जातो नट्ट।। सावली सुरत सोवणी, मेलत पग मट मट्ट। बंसी बजा दे बोलती, नटवर जातो नट्ट ।। देखतां लार दौड़तो, राधे राधे रट्ट। नाचण रो जद कैवती, नटवर जातो नट्ट।। गौ रस लूट'र गौखड़ां, गटकतो छाछ गट्ट।  होत छती जद चोरियां, नटवर  जातो   नट्ट।। लटक'न साख लुकावतो,वट झट चढनै पट्ट। लाजती जदे मांगती, नटवर जातो नट्ट ।।...

फिरे कठैह अहीर

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 फिरै कठेह अहीर बैठो का पट ले वटे, तट जमना रै तीर। का टोगड़िया टोलतो, फिरे कठेह अहीर।। का गुलेल लै गैरतो, गोपी रो घट  नीर । का माखणियो चोरतो, फिरे कठेह अहीर।। तान मुरलिये टैरतो,  घन घुमड़त घीर घीर। सुदबुद सब री सोसतो, फिरै कठेह अहीर।। साळ्यां दूहे छाळियां, खंड नख ठासे खीर। फुँकफुँक पदमा पावसे, ग्यो इण नीत अहीर।। मौजा ब्रज री मोकली, सोचे  सागर क्षीर। पद्ममा पग्ग पलोटती, साह् रे सुतो अहीर ।। गैळो काढे गाळियां, क्यूं सुणे धार धीर। बांथ्यां आवण आउरो, फिरै कठेह अहीर।। कष्ट भलां रा भांजियां, भलीज लीनी भीर। म्हारे क्यूं नी आवियो, फिरे कठेह अहीर।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°दीप चारण

कृष्ण दास जी छीपा कृत करूण अस्टक

 *कृष्णदास छीपा कृत करूणाष्टक*       दोहा भव भव बंधन भंजिया कृष्ण  सुधारत काज ! करूणा अष्टक कहत हुं,  मानीजो महाराज !! 🌹छन्द जात ईन्दव🌹 मृग बंद को फंद मुकुन्द कटयो दुख द्वन्द हटयो विरदावन में । ग्रही ग्राह प्रचंड समंद विचाळ गजेंदर की टेर  सुनी छिन में . धर उपर घंट गयंद धरयो खग ईण्ड उदार कियो रण में . रघु नन्द गोविन्द आनन्द घणा कृष्णा चीत धार रहो ऊन में !!१!! भयभीत बनी अति दुत भयंकर सीत हरि ज्यों अनीतन में । ललकार हुंकार ही मारि दशानन प्रान लियो अपना पन में । दशकंध के भ्रात अनाथ के  नाथ सनाथ कियो गढ़ लंकन में । रघुनन्द गोविन्द आनन्द घणा कृष्णा चीत धारि रहो ऊन में !!२!! पट खेंचत नार पुकार करि अरी भाव भरयो दुर्योधन में . हरि ,हे हरि ,हो हरि ,हाय हरि तुं क्यों न मरि जननी तन में . तिण बेर करी नह देर लगी  हरि अम्बर शीर ओढावन में । रघुनन्द गोविन्द आनन्द घणा कृष्णा चीत धारि रहो ऊन में !!३!! मतिमन्द सुरेन्दर अन्ध भयो गयो गौतम घर व्याभिचारन में । नीज नार का लार विकार करी रिषी श्राप उण कारन में । रघराय फटाय मिटाय शिला तन पार करी पद छारन में ...

बरसात अर अनावड़ो

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 बरसालो अर अनावङो आंधी आय अड़ड़ अड़ड़ ,घररर घन गरजीय । पला पल पलकै बीजली , घोर  मेघ  बरसीय  ।। कड़कत खैण कड़ड़ कड़ड़ , पड़ड़ड़ पड़े पनाल । पीय  परदेस  रंजियो , सेजां  धण  बेहाल ।। असाढ अंबर गरजियो ,घम घम मेघ घुरंत।  तेग वेग चपला चमक , धण ऐकली डरंत ।। काळ भइ रैण कालकी , घरां ऐकल डरंत। बाट जोउ आय बारनै  , बेगौ   आये   कंत ।। होय घणी हिड़की तड़ित , खीण खीण मुइ खाय । परदेस जा बसे पिया , जल झड़  तन  झुलसाय ।।   चपला  देखे  चापली ,  सजनी  रजनी  माय । प्राणहीन तन लाधसी  ,नाह जे तु नह आय ।। ••••••••••••••••••••••••••दीप चारण

संस्मरण :- गांव की सुबह

संस्मरण :- गांव की सुबह मैं बचपन से ही शहर में रहता हूं। बचपन में ग्रीष्मकालीन अवकाश के दिनों में गांव चला जाता था। मेरा गांव बैह चारणान जोधपुर से करीब 65-70 कि. मी दूर ओसिया तहसील में स्थित हैं। जो चारों तरफ रेतीले धोरों और पडाड़ से घिरा हैं खेतासर गांव पार करके गांव की सीमा में प्रवेश करते समय सड़क मार्ग रातड़ी भाखर हैं इसकी सीध में बरोबर आने पर गांव दिखाई देने लगता हैं गांव के पीपल वृक्ष घर आदि दिखने लगतें हैं। अंधाधुंध खनन से रातड़ी भाकर प्राय लुप्त सा होने लगा हैं। भाखर से सटा लंबा और ऊंचा विशाल टीला दूर बैह नाडी से आगे  बहुत दूर तक जाता हैं अर्द्ध चंद्राकार आकार बनाता हुआ, इन्हीं धोरों के पीछे संध्या काल में सूर्य अस्त होता हैं। उस  वैला में लाली युक्त नजारा अत्यधिक मनमोहक होता हैं। इन्हीं धोरों के पीछे शायद चिराई गांव का एक टावर दिखाई देता हैं। सड़क के रास्ते गांव के भीतर की तरफ प्रवेश करने पर करणी माता का मंदिर और ओरण भूमि प्रारम्भ हो जाती हैं। मंदिर परिसर और ओरण में मनीष जी माड़साब और करणी युथ क्लब की कठिन मेहनत से वृक्षारोपण व उनकी देखरेख से गांव का प्राकृतिक सौन...

संस्मरण :- तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

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भूली बिसरी यादें                  संस्मरण              शीषर्क :- तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा              लेखक :- दिलीपसिंह (दीप चारण) बात 90 के दशक की हैं, उन दिनों टेलिविज़न किसी किसी के घर पर ही हुआ करता था। ब्लेक एंड वाईट स्क्रीन के टीवी होते थे अमुमम, कलर टीवी तो कुछेक अमीर वर्गीय तबके के घरों में होते थे। मध्यम वर्गीय टेलिविज़न युक्त घरों में तो सिर्फ दुरदर्शन चैनल ही एकमात्र विकल्प होता था।  मैं उन दिनों पांचवी  कक्षा का छात्र था बचपन में इतवार का दिन तो पड़ोस के सहपाठियों के घर पर ही बीतता था। रंगोली नामक गीतों का प्रोगाम तो चूक ही जाता था। 9 बजे से पहले चाय नास्ता करने के बाद मैं एक बाल मित्र के घर चला जाता था। 9 बजे श्री कृष्णा, केप्टन व्योम, शक्तिमान इत्यादि धारावाहिक देखकर एक डेढ बजे घर आता, नहाना खाना आदि अत्यावश्यक काज निपटाने के बाद करीब चार बजे पुनः बाल मित्र के घर दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाली साप्ताहिक हिंदी फिचर फिल्म देखने के बाद स्व गृहप्रव...

हमारा बचपन हमारे खेल

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शीर्षक :- हमारा बचपन हमारे खेल लेखक :- दिलीपसिंह (दीप चारण) मनुष्य जीवन  मनोविज्ञान के अनुसार कई अवस्थाओं से गुजरता हैं। परन्तु सामान्यतः हम चार अवस्थाऐं मानते हैं। 1.बचपन 2. किशोरावस्था 3.युवावस्था 4. प्रौढावस्था बचपन का दौर हर किसी के लिए जीवन का स्वर्णीम दौर होता हैं, इसके बीत जाने के बाद कोई भी उस दौर को नहीं भूलता। मौज-मस्ती और आनंद से भरपूर कोई चाह कर भी उसमें नहीं लौट सकता। गजलों में भी गाया गया हैं कि "ये दौलत भी ले लो, ये शौहरत भी ले लो, मगर मुझको लौटा दो। वो बचपन का सावन, वो कागज की कस्ती, वो बारिश का पानी। .......... हालांकि हमारे पास टीवी विडियो गेम, हेंड विडियो गेम, इलेक्ट्रॉनिक खिलोने नहीं हुआ करते थे। फिर भी हमारा बचपन कुछ अभावों के बावजूद भी भावों से तरबतर था। हमारे पास तो कई छुपाये हुवै खजाने होते थे जिनमें, खाली अनुपयोगी माचीस की छापें, कंचे, फिल्मी फोटू, गत्ते के लूढो सांप सीढी, व्यापार, खराब रेडियो के चुंबक, पत्थर के गडडे, इत्यादि। इसके अलावा कैई इंडोर आऊटडोर खेल हम खेलते थे। गांवों में ग्रीष्मकालीन अवकाश के दिनों में भरी दोपहरी पीपल के चोत...

काम प्रजालन नाच करे। कवि दुला भाई काग कृत

कामप्रजाळण नाच करे : रचना :- दुला भाया काग आजे पवित्र श्रावण मासनो बीजो सोमवार छे ते निमिते कविश्री दुला भाया कागनी रचना कामप्रजाळण नाच करे (छंद - दुर्मिला) परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे, भभके गण भूत भयंकर भुतळ, नाथ अधंखर ते नखते, भणके तळ अंबर बाधाय भंखर , गाजत जंगर पांह गते ; डमरुय डडंकर बाह जटंकर , शंकर ते कईलास सरे, परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे, (1) हडडं खडडं ब्रह्मांड हले, दडडं दडदा कर डाक बजे, जळळं दंग ज्वाल कराल जरे , सचरं थडडं गण साज सजे ; कडके धरणी कडडं , हडडं मुख नाथ ग्रजंत हरे , परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(2) हदताळ मृदंग हुहूकट,हाकट धाकट धीकट नाद धरं, द्रहद्राह दिदीकट वीकट दोक्ट,कट्ट फरंगट फेर फरं ; धधडे नग धोम धधा कर धीकट,धेंकट घोर कृताळ धरे, परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(3) नट तांडवरो भट देव घटां नट उलट गूलट धार अजं, चहँ थाक दुदूवट दूवट खेंखट,गेंगट भू कईलास ग्रजं ; तत तान त्रिपुरारि त्रेकट त्रुकट, भूलट धुहर ठेक भरे, परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(4) सहणाई छेंछ अपार छटा,चहु...

राजल बाई रा छंद

राजल बाई रा छंद  कवि पृथ्वीराज राठौड़ (बीकानेर युवराज ) कृत सारा सगतियां सरे , राजल थांरो राज । पीथल करे प्रार्थना , राजबाई महाराज ।। राजल राजल रटता. पीथल करे पुकार । विखमी पुल आ वरणी , वेग कराओ वार ।। तु चौराडी चारणी , हुं क्षत्री राठौड । नवरोजे नारी चढे , कुल ने लागै कोड ।। गजराज धायो गोविंद ,द्रोपद जदुराज । हुं तनां धावां हमे , राजबाई महाराज ।। धेनां छोडी धावती , वाडे वाछडियाह । उदाई डग आछटे , चीला डग चढियाह ।। आयो बीकाणो आगरो , पीथल ना पायोह । वले पीयाणो वहंता , दिल्ली दिस धायोह ।। केथ अकबर रो केलपुर , केथ चोराडो देस । आई आवो उंतावला , सुण पीथल संदेस ।। नवरात्री मेले निरख , निरखी सब नरीह । चंपा कंवरी केथ चले , पिथे पूकारीह ।। पग सामटे पग डहे ,वाहण विकरालीह । भटियाणी भेला हुआ , राजल रखवालीह ।। राजबाई रथ मो रमे , भमे शाही गरम । भमे अकबर रा भोगना , नम नम होवे नरम ।। अकबर छोडी उण दिन , नवरोजे री नीत । राजबाई रै सरणे , पीथल रहे नचीत ।। हल चल प्रथ्वी पर होवे , जल थल अथल जंग । पीथल री सुण प्रार्थना , राजबाई जबरंग ।। संकलन दिलीपसिंह चारण बैह चा...

सपाखरू बरसात नो गीगाभाई बारोट कृत

🌞    *मेघ सेना*     🌞 🌞    *गीगा भगत*  🌞          *||  सपाखरु  ||* मळ्यां वादळां घघुंबी काळां मेघवाळां धरा माथे चोमासारा सज्या गर्ये सघण समाढ वरा फेरी धरा सरे चडी फोज ईंद्रवाळी गाढा मेघ गाजा त्रुटा छपनारा गाढ (1) वीजळी मशालुं वाळी जळेळी आकाश वेगे धरी रंग लीलां पीळां खेंचीयां धनुष चोपदारा ललकारा मोरला जिंगोर्या सारा मेघ ओतरादा चडया हरख्या मनुष (2) ईंद्रजारा छुटी धारा भोमकारा मची ऐली नदीयांरा भर्या आरा स्त्रोवरारां नीर दादरारा कवेसरा कीरति गेंकिया दाडी बापैया बोलिया ठारोठारथा वजीर (3) गंगाजळां धधकियां खळकया डुंगर गाळा प्रथीवाळां नदीनाळां सिंधु ढाळां पूर खंखाळ्या जमीका खाळा दु:ख दवा टाळ्या खेह नवे खंडांवाळा ढाळा प्रगटाणां नूर (4) पीलंबरी लालफूली लीलंबरी बणी प्रथी धनश्याम माथे छुटी मेघरी घेघुंब पा'ड घेर्या रीछां वाळे टुक माथे जर्यां पाणी जमीं बणी फळ फुले घणी लुंबजुंब (5) रांकवाळी मटी खद्या मो'ल भाळी थिया राजी केतामान स्त्रोवरारा छलकया किनार तृण चारा करेवाने मेखीयुं ना हाल्यां टोळां ...

लांगा चारण री कटारी गीत जात सफाखरू /सुपंखरो मेरामण जी जाडेजा राजकोट

"कट्टारीनु किर्तन " (सफाकरु गीत) ~~~~~~~~~~~ भली वेंडारी कट्टारी लागा अेतादी कळाका भाण संभारी कट्टारीमाहे होवाते संग्राम.। हेमजरी निशरी वन्नारी शात्रवाका हैया. अजा बीआ मागे थारी दोधारी ईनाम.।। पट्टी अट्टी आखरा की जम दट्टी कट्टी पार. ध्रुसटी शात्रवा हैये राखवा धरम.। बंबोळी रत्तंमा थकी.कंकोळीशी कट्टी बार. होळी रमी पादशारी नीशरी हरम.।। अषाढी बीजली जाणे उतरी शी अणी बेर. मणी हिराकणी जडी नथारे सम्राथ.। माळीअे हो मृगानेणी बेठी शत्रशाळी मांय. हेमरे जाळीअ करी शाहजादी हाथ.।। करी वात अखीयात अणी भात न थे काणी. जरी जाळीयामा तरी जोव जांख जांख.। शात्र वाका हैया बीच सोसरी करी ते जेसा. ईसरी नीसरी के ना तीसरीसी आँख।। कर्ता - महाराज मेरामणजी राजकोट पोस्ट - भगुभाईगीडा जसदन टाईपींग - भगुभाईगीडा जसदन (काठीदरबार)   " वोट्सप्प " @भगुभाईगीडा लोकडायरागृप जसदन@ जोडावा माटे मो.7567835462
मंडोवर नरेश नाहड़राव पड़िहार द्वारा गिरनार की तलहटी में जाखेड़ा गांव निवासी नरसिंह भाचलिया को सिंह-ढायक पदवी से नवाज कर प्रोलपात्र बनाकर मानसरोवर सम मोगड़ा जागीर बगसीस करने की गाथा लिखने का प्रयास । तन मन लागी प्यास,ताण कबाणां दौड़तां।  पूग्या पुष्कर पास, इंदा नृप आखेट नै।। खावे तावड़ खार, जेठ माह अति जोर तप। पुगा अरावल पार, प्यासा पाणी आस में ।। तिस्सा नाहड़ राव जी, मही मंडोवर भूप। फिरे थळ जळ जोवता, कठे न दीसै कूंप।। गौ खुर खीणी  खाड में, थो पाणी थोड़ोह। पाणी महिप झट पी गया, मलगु किय न मोड़ोह।। पेय महिप ज्यूं ही पियो, सुचंग होय शरीर। सरवर खुदांउ सांतरो, ठहरांऊ इत नीर।। खूद सरवर खुदाय, आयो नृप मजदूर ले। थो जैसो ही थाय, कठे न सिरके हेक कण।। ................ °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°दीप चारण जाखेड़ो गांव हो जठे , तलहट गढ गिरनार। भाचलियो नरसिंह भट, करतो नार शिकार ।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°दीप चारण

मेरी हसरत पर तेरी मेहरबानी नहीं चाहिए ।

https://www.writersmood.com/2019/06/blog-post_48.html?m=1 मेरी हसरत पर तेरी मेहरबानी नहीं चाहिए, आरजू उलफत पे तेरी कुर्बानी नहीं चाहिए। हम ही अपने इश्क पे नाज कर लेंगें ऐ दिल, इस ताहिर को अब कोई दिवानी नहीं चाहिए। बिन तेरे जो झट डूब जाए सूर्ख साहिल पर, दरिया के मुसाफिर को वो कस्ति नहीं चाहिए। बीके जो नोटो में बटकर लड़े जो मजहब पर, मालिक इस मुल्क को वो बस्ती नहीं चाहिए। उजाड़ गुले- गुलशन विरान करे हशीं जहां को, मन बहलाने मौला ऐसी मस्ती नहीं चाहिए। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°दीप चारण

इक बार भी नहीं पुछा कि कैसे हो? "दीप"

https://www.writersmood.com/2019/06/blog-post_14.html?m=1 अक्सर गुजरता हूं तेरी गलियों से, हाल चाल पूछता हूं मैं कलियों से, कोई करता नहीं मुझसे जिक्र तेरा, ले लेता हूं तेरी खबर तितलियों से।। काफी अर्से बाद मिले हम बीच राहें, धड़कने बढी दिल भरने लगा आहें, तुने हटा ली मेरी डटी तो हटी ही नही, बस इत्तफाक से यूं मिल गयी निगाहें।। सोचता होगा? यूं देखोगे कब तलक, इतनी क्यों हशीं लगती है मेरी झलक, मुकम्मल वक्त जो था वो बीत गया, कब तलक तरसती रहेगी तेरी पलक।। अब तो बहुत कम ऐसे मोड़ आते, जहां कभी हम तुम टकरा ही जाते, जा बस गये तुम किस गैर दुनिया में, आज भी उस गली में अलि मंडराते। झरोखे से झांकती ना थी मोटर जीप, निहारती इक टक स्वाति बूंद ज्यों सीप, निगाहें टिकी रहती थी ओझल होने तक, आज इक बार भी न पूछा कि कैसे हो? "दीप" । °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°दीप चारण

पोंपली रा सौरठा

पोंपली रा सौरठा सह स्विस वालो केश, भेलो धर धन भारियो। जाइ बैगी बिदेश, पोंपा चढने पालखी ।। बोटा में मीठी बोल,  जन धन ब्होत बुहारियो। जनतंत्र पोलम पोल, परवाण चढ़ि हि पोंपली।। दीन रो दुःख अखूट, राड़ा देसी रांड त्नै । लीवी मुरधरा लूट, पड़सी कीड़ा पोंपली।। आदम कर अपराधि, काम निज्ज रा काढिया। गीरती देख गाद्दि, पाड्या दगेउ पोंपली ।। रथ चढ रूलंतीह , गाढो जन धन ढोलियो। लाज न आवंतीह, रक्तमद पिते पोंपली।। पोल ऊंचली राख, दिग्गजां ने नि धारती। गटकत दारू दाख, पग ते पग रख पोंपली।। जाती ने जूहार, बांगरी लारे फेरसा । भू तज ज्यूं भरतार, पाछल न फोरि पोंपली।। धोबा भर भर धूड़, बैगी लारे बालसां । फकत (थूं) निकली फूड़ , पछि मत मरजे पोंपली।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°दीप चारण

मूलदान जी सा भू की स्मृति में सौरठा

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तरुवर ताल उदास, खग उदास खेलड्डियां। उदास भू को उजास, डग डग उदास डांगरा।। झड़ंत उदास झाड़, बोर उदास बोरड्डियां। उदास माड़ पहाड़, मानव उदास माड़ रा।। जाजम उदास जोर, उदास डोडा डोकरा। प्रोलां उदास पोर, उदास अमल मनवारिया।। आवसे घणि अडोल, पग धरतां भू भोम पर। बैठां सुणजसि बोल, मधुर कया ज्का मूलजी ।। कुण अब करसी कोड, रूत रीत त्योहार रा। छैका ग्या थें छोड, बिलखै घण मन मूलजी।। उदास बैलां बाग, बिलखता बागबान बिन। उदास भू रो भाग, म्हानै लखाय मूल जी।। मगरां उदास मोर, कुरजां अति कुरलावती। भू री उदास भौर, म्हानै लागे मूलजी ।। नैणा निठ्यो नीर, उनाले जिम नाडियां । हिये माहि आ पीर, मावै नाही मूलजी।। गवाड़ उदास गांव, भू सह भोपां अरु भिंयां। उदास दरखत छांव, मोला हि खेत मूलजी।। असमाण मोलो भाण, मोलो भू रो  मिनख मन। मोलो नगर जैसाण, मन नै लागे मूलजी।। अपणायत सहृदय के धनी थे मूलदान जी सा रत्नू भू

जगदीशाष्टकम् (दीप चारण कृत)

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जगदीशाष्ठकम् ( दीप चारण कृत)   ।।  दोहा ।। सुर दे   माता  सारदे,   अम्बा  दे  आशीष। लछमी माते लाज रख,जपे दीप जगदीश।।       ।। छंद मोतीदाम ।। तुहीं मम मात तुहीं मम तात। तुहीं मम मीत तुहीं मम भ्रात।। समो झट आय मिलो घल बाथ। नमो जगदीश निरंजन नाथ।।   [1] तुहीं मम भीर, तुहीं मम पीर। तुहीं मम लाज, तुहीं मम चीर।। लगूं नित पाय, नमे नित माथ। नमो जगदीश निरंजन नाथ।।  [2] बसा उर कान सदा धर ध्यान। उचार विचार सुसार सुजान।। सदा सिंवरे जन जोड़'र हाथ। नमो जगदीश निरंजन नाथ।।  [3] तुहीं गिरि ओड़ सुरेश मरोड़। तुहीं तम तोड़ तुहीं रणछोड़।। प्रभू! परमेश सदा रह साथ। नमो जगदीश निरंजन नाथ।।  [4] सुणे तु सदाय करूण पुकार। जपूं जय जैय करूंह जुहार ।। नशीब सुधार इ ठाठज ठाथ। नमो जगदीश निरंजन नाथ।।  [5] तुहीं जग मंडण पालनहार। धरा धरि दाढय आसुर मार।। पुजे नर नार ऋषी मुनि जथ्थ। नमो जगदीश निरंजन नथ्थ।।  [6] तुहीं सुख वैभव देवण वाल। तुहीं दुख भंजण दीन दयाल।। तु कौरव कूटण ठाय भराथ। नमो जगदीश निरंजन नाथ। ...

घोड़े रो सूपखरू कवि दुला भाई काग कृत

वाह घोडा वाह – कवि दुला भाया “काग” गीत सपाखरू छूटा ग्राहबे वोम बछूटा रोकता धराका छेडा उठाहबे पागा महि शोभता अथोग धाहबे खगेश तके वेगरा अथाह धख्या साहबे नाखता पागा नटव्वा अमोध (1) डाबला मांडतां धरा धमंके साबधी दणी झमंके साजहीं कोटे रंभरा झकोळ चमके वाहसे जाणी वीजळी जालदा चळी भ्रम्मवाळा भारे ठाळा गतिवाळा मोर (2) वांभशी सांकळांवाळा टांक कानसोरी वदां कुरंगां आंखडीवाळा मूलरा करोड भालावाळा लटां केश फोरणां उलंधी भजे जटाळा जोगंद्र नहीं पटाळाकी जोड (3) छाछरा भालरा छातीयां ढालरा समां चोडा त्रींग बाजोठरा खाळीया सढाळ साकाबंधी तांसळीरा ओपता डाबला चोडा ठमकंता घोडा नाडा तोड सांधे ठाळ (4) अंजळिमां पीता पाणी मोकली वखाणी आप जांगळां थोकरा धरा पूंछरा झपाट केशवाळी ढींचणारा ओवाराणा लीये काजु थडक्के धरास वांसा डाबकी थपाट (5) लगामे गराया हाथ ऊतरे गढांपे लाया टोळे मृग्गवाळा फोळे खीजीया तोखार चडाया वा’णरा सढां देखी कंपे निज छाया नाचरा नचाया के हसाया नरां नार (6) करंता नख्खरा देखी धरापति रीझे केक डरंता माठरा नरा घडेला देखाव बाथां पाव उंडळां के भरंता भोमरी बथ्थां नवल्ला बनाया घोडा ब...