इक बार भी नहीं पुछा कि कैसे हो? "दीप"

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अक्सर गुजरता हूं तेरी गलियों से,
हाल चाल पूछता हूं मैं कलियों से,
कोई करता नहीं मुझसे जिक्र तेरा,
ले लेता हूं तेरी खबर तितलियों से।।

काफी अर्से बाद मिले हम बीच राहें,
धड़कने बढी दिल भरने लगा आहें,
तुने हटा ली मेरी डटी तो हटी ही नही,
बस इत्तफाक से यूं मिल गयी निगाहें।।

सोचता होगा? यूं देखोगे कब तलक,
इतनी क्यों हशीं लगती है मेरी झलक,
मुकम्मल वक्त जो था वो बीत गया,
कब तलक तरसती रहेगी तेरी पलक।।

अब तो बहुत कम ऐसे मोड़ आते,
जहां कभी हम तुम टकरा ही जाते,
जा बस गये तुम किस गैर दुनिया में,
आज भी उस गली में अलि मंडराते।

झरोखे से झांकती ना थी मोटर जीप,
निहारती इक टक स्वाति बूंद ज्यों सीप,
निगाहें टिकी रहती थी ओझल होने तक,
आज इक बार भी न पूछा कि कैसे हो? "दीप" ।

°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°दीप चारण

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