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Showing posts from September, 2011

dilnshin: भुलां न म्हेँ थांरा चरण । (स्वतंत्रता सैनानी क...

dilnshin: भुलां न म्हेँ थांरा चरण । (स्वतंत्रता सैनानी क... : भुलां न म्हेँ थांरा चरण । (स्वतंत्रता सैनानी कवि केसरीसिँह बारहठ) जय जय भवानी अम्बिका करणी तिहारी म्हे सरण भोत सोया गाढ निद्रा चा व...

dilnshin: प्रज्वलन by Dilip Singh Charan on Tuesday, 22 Febr...

प्रज्वलन मैँ मिट्टी का पात्र तेरा , तुं ज्योति मेरी  मैँ दिप तेरा , तुँ बाति मेरी तुं मुझमेँ कब प्रज्वलित होगी ? कब मेरा दिल चाँद सा होगा कब ज्योत्स्ना मुझमेँ होगी ? क्या मेरे चेहरे पे सदा अंधियारा रहेगा ? या फिर कभी मेरी भी आँखे नूरानी होगी ? अब तो बता दे मेरे रब्बा अब तो बता दे मेरे रब्बा कब होगा तुं मुझसे अबा कब तेरी मेहर मुझ पर होगी ? जरा इधर भी तो देख , क्या क्या है अरमां मेरे दिप खङा हैँ दिप पङा हैँ दर पे तेरे  दिप चारण

प्रज्वलन by Dilip Singh Charan on Tuesday, 22 February 2011 at 09:12

मैँ मिट्टी का पात्र तेरा , तुं ज्योति मेरी जग मग करता मैं दिप तेरा , तुँ बाति मेरी तुं मुझमेँ कब प्रज्वलित होगी ? कब मेरा दिल चाँद सा होगा। कब ज्योत्स्ना मुझमेँ होगी ? क्या मेरे चेहरे पर सदा अंधियारा रहेगा ? या फिर कभी मेरी भी आँखे नूरानी होगी ? अब तो बता दे मेरे रब्बा अब तो बता दे मेरे रब्बा कब होगा तुं मुझसे अबा कब तेरी मेहर मुझ पर होगी ? जरा इधर भी तो देख , क्या क्या है अरमां मेरे दिप खङा हैँ दिप पङा हैँ दर पर तेरे दर पर तेरे ••••••••••••••••••दिप चारण

निगाहें

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निगाहें  तेज हवाओं ने चिराग बुझा दिया।  दिल में दबे जज्बातों को जगा दिया ।  आज हम फिर से कलम लेकर लिखने लगे लबों पे मचलते लफ्जों को ,  किसी कि नशीली निगाहों ने शराबी सा शायर बना दिया ।  उसकी आँखों के दो जाम  हशीन कर दे हर शाम  जब वो साकी बनकर , निगाहों से पिलाये महशर महकश को औसान नही कब हो जाये शब से सहर ।  निगाहों से छल छल छलकते पैमाने ।  इन निगाहों के आगे कुछ भी नहीं  दुनिया के सारे महखाने ।  जो तलब तेरी ये निगाहें बुझाये ।  वो खुदा भी मिटा ना पाये इक तरफ मुझे गले लगाने को खुदा फैलाऐं अपनी बाहें इक तरह हो तेरी ये दरिया- ए -महसर निगाहें खुदा की कसम हम तेरी निगाहों मे डुब जायें।।  खुदा की कसम हम तेरी निगाहों में डुब जाये ।।  हवाऐं थमी चिराग फिर जल उठे ।  नूरे सैलाब आते ही वो हम से रूठे ।।  मेरी तसव्वुर के सारे आइने टुटे ।  ना जाने वो निगाहों के महखाने किसने लुटे ।।  जैसे ह...

Maan ka bhanwar By Dilip Singh Charan · Friday, 18 February 2011

अपना लिखा मुझेँ कुछ याद नहीँ रहता दुसरोँ का लिखा पढकर मैँ खुश रहता अपनी मनो भावना मैँ निरंतर बहता बीना पतवार कि कस्ति लिये मै तैरता मैँ जिधर जा रहा हुँ उधर कोई साहिल नहीँ जिधर साहिल है उधर मुझे जाना नहीँ मेरे कदमोँ के निचे न जल थल न अम्बर फिर भी न जाने मैँ कैसे चल रहा निरंतर मेरे जज्बोँ का न कोई विषय न कहानी हैँ कभी आशा कभी निराशा तुकान्त जीवन रवानी हैँ अपनी भावनाओ मे भावुकता लिये मैँ निरंतर बहता मेरी कोई व्यथा हैँ ही नहीँ तो मैँ किसी से क्या कहता दोस्तोँ की महफिलोँ मे मैँ अक्सर खामोश रहता अपनी भावनाओ के भंवर मेँ उलझा रहता सदैव मन ही मन मेँ कुछ सुलझाता रहता कुछ सुलझानेँ मेँ मैँ सदैव उलझता रहता मेरी कविता का विषय कहीँ गुल हो गया मैँ कलम कागज पेँ टिकाये सोचता सोचता सो गया ये कैसी डोर हैँ ? जिसका मिलता नहीँ पर कहीँ तो छोर है । मुझे उलझाने वाला वो नटखट माखन चोर हैं । या कोई ओर है? कवि दिप चारण

आसो जी बारठ

(कौटङै रा बाघ जी ) कवि आसो जी बारठ भारमली रा घाट पर बाघौ लुम लटक्क । जहँ तरवर तहँ मोरिया,जहँ सरवर तहँ हंस । जहँ बाघौ तहँ भारमली , जहँ दारू तहँ मंस ।। बाघा हालै बेग , दुख सालै दूदा हरा । आठूँ पहर उदेग , जातौ देगौ जैत वत ।। हाठोँ पङी हङताळ , हमेँ मद सूंगा हुआ । कूकै घणाँ कलाळ , बिकरौ भागौ बाघजी ।। कूकङ ज्यू कुरळावियौ , ढलती माँझल जोग । कै थनैँ मिनङी झाँपियौ , कै बाघा तणौ विजोग ।। बाघा आव वलेह , घर कौटङै थूँ धणी । जासी फूल झङेह , वास नँह जासी बाघजी । ठौङ ठौङ पग दौङ , करस्याँ पेट ज कारणै । रात दिवस राठौङ वीसरस्याँ नहिँ बाघ नैँ ।। की कह की कह की कहूँ की कह करूँ बखाँण । थारौ म्हारौ नँह कियौ , ऐ बाघा अहनाँण ।। आसो जी बारठ
कविता एक दर्द भरा मजाक कविता तो लिखनी चाहुं मगर लिख ना पांऊ । भूतपुर्व प्रेमिका याद नहीँ आती , feeling मैँ कहा से लांऊ ।। कविता तो लिखनी चाहुं मगर लिख ना पांऊ । आजकल कुछ लिखा नहीँ जा रहा , जी करता हैँ एक बार फिर इश्क की दरिया मेँ डुब जांऊ । अब तो बाल भी सफेद हो रहे हैँ , इस बुढापे मेँ प्रेमिका क्हाँ से लांऊ ? कविता तो लिखनी चाहुं मगर लिख ना पांऊ । चलो कोई मिल भी गयी , तो समस्या ये होगी कि , इस बेरोजगारी मेँ फोन का बेलेँस कहा से लांऊ ।। मान लो कवि दिप अगर कोई मिल जायेँ तोँ ? तो क्या फिर से कविताओ के ढेर लगांऊ । कविता तो लिखनी चाहुं मगर लिख ना पांऊ । कवि दिप चारण

कविता तेरा नाम .... दिप चारण by Dilip Singh Charan on Friday, 03 June 2011 at 13:40

कविता तेरा नाम .... दिप चारण तेरा नाम है अमावश्या पर्णिमा लाता । तेरा नाम है चाँद को जगमगाता ।। तेरा नाम हैँ धरा पे रोशनी लाता । तेरा नाम है तपि वसुंधारा पे शितलता फैलाता ।। तेरा नाम है मुझे रब से मिला प्रीत का नजराना । तेरा नाम है मेरी उटपटांग कविताओ का तराना ।। तेरा नाम है जलती शमां . मै इक परवाना । तेरा नाम है मेरी जिँदगीँ का अफसाना ।। तेरा नाम है मेरा मधुमय मधु का प्याला । तेरा नाम है मेरा साकी , मेरी मधुशाला ।। तेरा नाम है मेरी आवारगी पर ताला । तेरा नाम है मेरी सांसोँ कि माला ।। तेरा नाम है मेरे नैनोँ से गिरते मोती । तेरा नाम है मेरे ह्रदय मेँ प्रीत कि जलती ज्योति ।। तेरा नाम है मेरी फुर्सते -हस्ती । तेरा नाम है मुझे तारने वाली कस्ति ।। तेरा नाम है मेरे ह्रदय मेँ खिलते फूल । तेरा नाम है मेरी मोसमे- गुल ।। तेरा नाम है मेरी नूरे -निगाह । तेरा नाम है मेरी राहते- रूह ।। तेरा नाम है मेरी अधुरी हसरत । तेरा नाम है मेरी बढती वहशत ।। तेरा नाम है मेरी दिले- सदा । तेरा नाम है मेरी नूरे- खुदा ।। तेरा नाम है हर दम हर क्षण मेरे साथ । तेरा नाम है अगम अगोचर अलख परमार्थ ।। तेरा नाम है मेरी हश...

chandni By Dilip Singh Charan · Friday, 10 June 2011

आज चाँद से लङ रही हैँ चाँदनी बादलोँ कि सैना लेकर चाँद को घेरा है और कह रही ...चाँद से चाँदनी वो देखा धरा पर बाङमेर शहर मेँ एक छत पर जल रहा दिप प्यार मेरा हैँ छम छम करती चम चम चमकती धिरे धिरे ठुमकती मेरी छत पे उतरती है मेरे पास आकर केशु खोलकर सिर झटक कर जुल्फेँ बिखेर कर सुन्हरी जुल्फेँ मेरे रुख पर डालती हैँ बाहोँ का हार मुझे पहनाकर गले लगाकर ऐतबार ए मोहब्बत चाँदनी करती है...

tera didar By Dilip Singh Charan · Friday, 10 June 2011

आज काफी अर्से बाद देखा तुझे खुदा जानें ना जाने क्या हुआ मुझे तेरे मेरे ये कैसे रूहानी ताल्लुकात है ? तेरे माथेँ पेँ बिँदियाँ , माँग मेँ सिँदुर , ...हाथोँ मे चुङियाँ, पाँवो मे पायल ये सब देख के क्योँ हो मेरा दिल घायल क्या लेना देना मेरा इन से ये सब तेरे जिस्मानी अलंकार हैँ । आज अहसास हुआ प्रीत सदा निस्वार्थँ तथा बधनोँ से परे होती हैँ ।

ONIGHT MOONLIGHT IS SO SAD. DEEP CHARAN by Dilip Singh Charan on Wednesday, 15 June 2011 at 22:00

आज रात चाँदनी उदास हैँ उसकी उदासी मुझसे देखी नहीँ जा रही । चाँदनी चिँख चिँख के कह रही, कोई तो रोको ये काली घटाऐँ किधर से आ रही । बचाओ ये मुझे दाग देने आ रही । मेरी रोशनी जा रही आज रात चाँदनी उदास हैँ उसकी उदासी मुझसे देखी नहीँ जा रही । दिप चारण

Aam aadmi ki dbi hui aawaj by Dilip Singh Charan on Sunday, 17 April 2011 at 11:52

Jatiwad , vanswad , chetrawad . Hai is rajnitik khet ki khad . Ghppale , ghotale , ghus inka parmukh aahar . Mehngai bdhakr , rtet karwa kr janta pe karte ye atyachar . Vesiya se bhi ganda jisme netao ka chritra hai. Kya wo yhi loktantra hai ? Kvi deep charan

भुलां न म्हेँ थांरा चरण । (स्वतंत्रता सैनानी कवि केसरीसिँह बारहठ)

भुलां न म्हेँ थांरा चरण । (स्वतंत्रता सैनानी कवि केसरीसिँह बारहठ) जय जय भवानी अम्बिका करणी तिहारी म्हे सरण भोत सोया गाढ निद्रा चा वां अबै म्हे जागरण सुतंतरता री महा सागर थारा हि हां म्हे निरझरण जय जय भवानी अम्बिका करणी तिहारी म्हे सरण राष्ट्र बल रौ उध्दरण मां तुं करै म्हे अनुसरण परमारथ मेँ बलिदांन निज करणोँ सिखाद्यां म्हे मरण जय जय भवानी अम्बिका करणी तिहारी म्हे सरण संतान साची अभै व्है थारा ही म्हे तारण तरण साम्रत्थ द्यो मां कर सकां आ सिध्द म्हे चारण बरण जय जय भवानी अम्बिका करणी तिहारी म्हे सरण वाहण तुंहाळौ केसरी बर मांगवै असरण सरण ओ असुर मरदनि चंडिका भुलां न म्हे थारा चरण जय जय भवानी अम्बिका करणी तिहारी म्हे सरण छप्पय चन्दू बेगी चाल , चाल खेतल बड चारण तोलो हाथ त्रिशूल , धजाबंध लोवङ धारण बीस हथी इण बेर , देर मत कर , डाढाळी हरो रोग हिँगलाज , करो ऊपर महाकाळी लगाज्यो देर पल एक मत , आवङ जी री आण सूं आखता सींह चढ आवज्यो, देबी गढ देसाण सूं

अन्ना राम सुदामा री दो चार पक्तियाँ

गात मेँ प्रभात जाणूं आपरी पीतिमा भरी चंदण सुबास दी होठां स्यामता कोकिला बैण कमल नैण कुण जाणै कितां रै रंग रुप सूं जादूगरणी तूं धङीजी एकली मुगत डग धरती भँवरा री भीङ मेँ छीङ करती मुळकती सुन्दरी सिनेमा घर मेँ बङी । सो खतम कर भीङ मेँ कण टांटियै सै भद्र जन लियो बूकियै पर कवळै चूंटियै सो चूंठियो भर जीवतो ही सरग पूग्यो जीवण री अभिलाख पोरवी उछळती लैर सो कुण जाणै कठै मिल्यो बह चली भीङ री भागीरथी खनै खङो कवि उपमा अनुप्रास मेँ डूब्यो नैण मेँ दै नैण सामनै जोयो मेघरो मूंढो जोवतै तिस्से पपैयै सो ।

aa rajsthani bhas hai sakti dan kaviya

कविता आ राजस्थानी भासा हैँ सक्तिदान कविया इणरो इतिहास अनूठो है , इण मांय मुलक री आसा है । चहुं कूंटां चावी नै ठावी , आ राजस्थानी भासा हैँ ।। 1 . जद ही भारत मेँ सताजोग , आफत री आंधी आई ही । बगतर री कङियां बङकी ही , जद सिँधू राग सुणाई ही । गङगङिया तोपा रा गोळा , भाला री अणियां भळकी ही । जोधां रा धारा जुङता ही खालां रातम्बर खलकी ही । रङबङता माथा रणखेतां , अङवङता घोङा ऊललता । सिर कटियां सूरा समहर मेँ ढालां तरवारा लै ढलता । रण बंका भिङ आरांण रचै , तिङ पैखे भांण तमासा है । उण बखत हुवै ललकार उठै , वा राजस्थानी भासा है ।। 2. इणमेँ सतियां रा सिलालेख , इणमेँ संतां री वाणी है । इणमेँ पाबु रा परवाङा , इण मेँ रजवट रो पांणी हैँ । इणमेँ जांभै री जुगत जोय , पीपै री दया प्रकासी हैँ । दीठो समदर सी रामदेव , दादू सत नाम उपासी हैँ । इणमेँ मे तेजै रा वचन तौर , इणमेँ हमीर रो हठ पेखो । आवङ करणी मालण दे रा , इणमेँ परचा परगट देखो । जद तांई संत सूरमा अर , साहित्यकारां री सांसा है । करसां रै हिवङै री किलोळ , आ राजस्थानी भासा है ।। 3. करमां री इण बोली मेँ ही , भगवान खीचङो खायो है । मीरा...

शिव ताण्डवं स्तूति कवि दिप चारण कृतं

शिव ताण्डवं स्तूति कवि दिप चारण कृतं डम डम बजाते डमरु घम घम घमते करते न्रत ताण्डवम । जटाऐँ बिखेरे भुजंग लपेटे उजङ मेँ घुमते कहते जिसे शिवा शिवम ।।  ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय । कर सोहे डमरु डमं डमं वाला त्रिशुल विशाला गल राजै भुजंग माला । जटाऔ मेँ गंगा शशि धारै, कटि पे पहने चिता मारकर चौला ।। ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय । ब्रम्हा विष्णु के साथ मिलके नित नित खेलते नवीन श्रृष्टि खेला । जगत वासी जिसे कहते भगङ भम्म भम्म बगङ बम्म बम्म भोला ।। ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय । जोगि बनके पर्वतोँ मेँ घुमते पीते घोट घोट कर भंगा । धुम्म तनन् तनन् नितनन् धुम्म तनन् तनन् नितनन् तगङी धिगङी तगङी धिगङी धुम्म तगङी धिगङी तगङी धिगङी धुम्म न्रत ताण्डव करते होके अध नंगा । ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय । शीश झुकाकर नत मस्तक होते सुर असुर इन्द्र अरु चन्द्र । जग का प्यारा सबसे न्यारा देवोँ का देव महादेव भोला बाबा रुद्र ।। ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय । दिदार तेरा पाकर मेनेँ चित मेँ बसा ली तेरी छवि । बस इतनी विद्या द...

सृष्टि करने का कार्य किया किसने , सृष्टि का कारण कौन हैँ ? by Dilip Singh Charan on Tuesday, 21 June 2011 at 15:44

                 कविता      सृष्टि का कारण कौन हैँ ? दशोँ दिशाओ को बनाया किसने , इस सुरज को पूर्व मेँ उदय करता कौन हैँ ? ये रात और दिन बनाये किसने , इन चाँद सितारोँ को जगमगाता कौन हैँ ? सृष्टि करने का कार्य किया किसने , सृष्टि का कारण कौन हैँ ? इस धरती को बनाया किसनेँ ,  इस धरती और अम्बर के बिच मेँ स्तम्भ कौन है ? इस सुरज को तपाया किसने, चाँद को शितल और तारोँ को टिमटिमाता कौन हैँ ? सृष्टि करने का कार्य किया किसने , सृष्टि का कारण कौन हैँ ? इन दरखतोँ को हिलाया किसने , इन हवाओ को बहाता कौन है ? इन कलियोँ को खिलाया किसनेँ , इन फूलोँ को महकाता कौन हैँ । सृष्टि करने का कार्य किया किसने , सृष्टि का कारण कौन हैँ ? सत्व किसका , उजाला किया किसने , रज्व किसमेँ तम को बनाता कौन हैँ ? प्रकृति बनाई किसनेँ , पुरुष सेँ संयोग करवाता कौन हैँ ? सृष्टि करने का कार्य किया किसने , सृष्टि का कारण कौन हैँ ? सृष्टि को रचाया किसनेँ , ये ज्वालामुखी, भुकम्प , सुनामी प्रलय लाता कौन हैँ ? म...

कविता - तेरी तस्वीर के टुकङे । दिप चारण

कविता - तेरी तस्वीर के टुकङे । घर वालोँ ने कचरे भेँक दियेँ छोटे छोटे करके टुकङे , तेरी तस्वीर के टुकङे तेरी तस्वीर के टुकङे । कचरे मेँ सेँ मै जोगी कि तरह चुग चुग कर लाया वहीँ टुकङे , तेरी तस्वीर के टुकङे तेरी तस्वीर के टुकङे । कुछ मिलेँ ही नहीँ ,कुछ गंवा दिये , और कुछ सम्भाल के रखे मैँने टुकङे, तेरी तस्वीर के टुकङे तेरी तस्वीर के टुकङे । तन्हाईयोँ मेँ सुनतेँ हैँ मेरे बैचेन दिल के दुखङे , तेरी तस्वीर के टुकङे तेरी तस्वीर के टुकङे । सुनके मेरा हाले-दिल रहते हैँ उखङे- उखङे , तेरी तस्वीर के टुकङे तेरी तस्वीर के टुकङे । दिप चारण