Dilip Singh Charan हो गयी सरकार चरित्रहीन , अब तो जल बीन मीन तङपनी चाहिऐ । अतिश्योक्ति हो रही अत्याचारोँ की ,अब तो बदलनी चाहिऐ ।। कब तक सुरक्षित रहोगेँ इसकी आङ मेँ , हो गयी ये छत जर्जर अब तो गिरानी चाहिऐ । दम घुट रहा हैँ बीन हवा केँ , अब तो आँधी उठनी चाहिऐँ ।। बहुत एकत्रित हो गया यहाँ कचरा , अब इस उकुङे को जला देना चाहिऐ । जहाँ जहाँ आग होगी वहाँ धुआ उठेगा समझे दिप , इससे मच्छर मरने चाहिऐँ ।। दिप चारण